कहानी: "महासती सावित्री का दृढ़ संकल्प"

कहानी: "महासती सावित्री का दृढ़ संकल्प"

प्राचीन भारत के समय की बात है। मद्र देश के राजा अश्वपति और रानी मलविका की कोई संतान नहीं थी। वर्षों तक संतान प्राप्ति की प्रार्थना करने के बाद, एक दिन देवी सावित्री ने उन्हें आशीर्वाद दिया, और कुछ समय बाद उनकी एक कन्या का जन्म हुआ, जिसका नाम उन्होंने "सावित्री" रखा।

सावित्री अत्यंत बुद्धिमान, साहसी और सुंदर थी। वह अपने माता-पिता की प्रिय थी, और उसका मन सदैव धर्म के मार्ग पर था। जब वह विवाह योग्य हुई, तो उसने स्वयं एक योग्य वर की खोज करने का संकल्प लिया। अपनी यात्रा में उसने सत्यवान नाम के एक राजकुमार को देखा, जो अत्यंत धर्मपरायण और सदाचारी था, परंतु उसका परिवार वन में निर्वासित जीवन बिता रहा था। सत्यवान की सादगी और सच्चाई से सावित्री प्रभावित हुई और उसने उससे विवाह करने का निर्णय लिया।

सावित्री के इस निर्णय से ऋषियों और दरबारियों ने उसे सावधान किया, क्योंकि सत्यवान की कुंडली में यह भविष्यवाणी थी कि वह विवाह के एक वर्ष के भीतर ही मृत्यु को प्राप्त करेगा। परंतु सावित्री ने इस भविष्यवाणी की चिंता किए बिना सत्यवान को ही अपना पति स्वीकार किया। उनके विवाह के बाद, सावित्री अपने पति और ससुर की सेवा में जुट गई।

विवाह के एक वर्ष पूरे होने में अब कुछ ही दिन बचे थे। सावित्री को अपने पति की मृत्यु की भविष्यवाणी स्मरण थी, और उसने तीन दिन का कठोर व्रत करने का संकल्प लिया। उसने दिन-रात उपवास रखा और भगवान की आराधना की। अंततः वह दिन आ गया, जब सत्यवान की मृत्यु होने की भविष्यवाणी की गई थी। सावित्री और सत्यवान वन में लकड़ी काटने गए। उसी समय, यमराज स्वयं प्रकट हुए और सत्यवान के प्राण लेने आए।

सावित्री ने अपने पति के शरीर को गोद में रखकर यमराज का पीछा करना प्रारंभ किया। यमराज ने उसे वापस लौट जाने के लिए कहा, परंतु सावित्री ने कहा, "धर्म के मार्ग पर चलने वाली पत्नी का धर्म है कि वह हर परिस्थिति में अपने पति का साथ दे।" यमराज ने उसकी अटल भक्ति और दृढ़ निष्ठा को देखा, और उसकी विनम्रता से प्रभावित होकर सावित्री से कहा, "तुम्हें अपने पति के प्राण छोड़कर कुछ और मांगना हो, तो मैं तुम्हें वरदान देने को तैयार हूँ।"

सावित्री ने पहला वरदान अपने ससुर के अंधत्व को दूर करने के लिए माँगा। यमराज ने उसे यह वरदान दे दिया। यमराज आगे बढ़ने लगे, परंतु सावित्री ने उनका पीछा जारी रखा। तब यमराज ने दूसरा वरदान देने की पेशकश की। इस बार, सावित्री ने अपने ससुर के राज्य को पुनः प्राप्त करने का वरदान माँगा, और यमराज ने उसे वह भी दे दिया।

इसके बाद भी सावित्री यमराज का पीछा करती रही। अंत में, यमराज ने उसे तीसरा और अंतिम वरदान देने की बात कही। सावित्री ने कहा, "हे यमराज, मुझे सौ पुत्रों का आशीर्वाद दें।" यमराज ने इस वरदान को भी स्वीकार कर लिया। तभी सावित्री ने कहा, "हे यमराज, यदि आप मुझे सौ पुत्रों का आशीर्वाद दे चुके हैं, तो मेरा पति सत्यवान जीवित रहना चाहिए, क्योंकि उसके बिना यह वरदान संभव नहीं है।" यमराज ने उसकी चतुराई और पति के प्रति उसके प्रेम को देखकर सत्यवान के प्राण लौटा दिए।

सत्यवान पुनः जीवित हो गया, और दोनों पति-पत्नी अपने घर लौटे। सावित्री की अटल भक्ति, दृढ़ संकल्प और चतुराई ने उसे उसके पति का जीवन वापस दिलाया। उसकी यह कहानी आज भी भारत में सच्चे प्रेम और निष्ठा की मिसाल मानी जाती है।

निष्कर्ष:

सावित्री की कहानी हमें सिखाती है कि सच्चा प्रेम और दृढ़ संकल्प किसी भी कठिनाई का सामना कर सकते हैं। उसकी भक्ति, साहस और चतुराई का प्रतीक है कि सच्चे प्रेम के सामने मृत्यु भी झुक सकती है।

By GKp 

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